उड़ता इंदौर.......
Monday, 5 December 2016
नशे पर चलता है किसका जोर....उड़ता इंदौर..
नशे-कशों का चलता है दौर..... कर ले इसका अनलिमिटेड है सोर्स...इन्टॉक्सिकेशन (नशे) पर चलता है किसका जोर....उड़ता इंदौर..उड़ता इंदौर
पंजाब नशे के गर्त में डूब रहा है, ये आप लोगों ने उड़ता पंजाब में देखा...खबरों के अनुसार हिमाचल में भी बेरोजगारी के चलते ये धंधा जोरों पर है, पर अगर आपको कहा जाए कि इंदौर जिसे आप एजुकेशन हब (सिर्फ कहा जाता है), मिनी मुंबई (जिसने मुंबई नहीं देखा वो इस दिखावे को सही समझ सकता है), भविष्य का मेट्रो शहर (आज संवर तो जाए कल की बात कल), दिलवालों का शहर (दिल लगाकर तो देखिये पता चल जाएगा), मिलों का शहर (सिर्फ यादें ही सहारा हैं), मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी (अर्थ में अन भी है ध्यान से देखें), जागरूक लोगों का शहर (झांकीबाजी का दूसरा नाम) और न जाने कितने नामों से जानते हैं, नशे के गर्त में डूब नहीं रहा या कि यहां इसका धंधा जम नहीं रहा, बल्कि ये तो इस अंधकार में ऐसा खो गया है कि शायद अब इसका दूसरा नाम डार्कइंदौर ही होगा।
नशे में डूबता शहर-
सुनने में अजीब लगता जरूर है पर ये सही है कि इंदौर, उड़ता पंजाब की तरह उड़ नहीं रहा है, बल्कि ये तो नशे की आकाशगंगाओं को पैदा कर रहा है। नशा हर स्तर के लोगों के लिये, हर तरह का यहां मौजूद है, हर कीमत पर हर एक को निगलने के लिए ये राक्षस तैयार है, वो भी बिना डकार लिए।
क्यों और कैसे फैल रहा है नशा?-
इंदौर शहर जिस तेजी से विकास का दम भर रहा है, उतनी ही तेजी से यहां के लोग नशे का दम मार रहे हैं। शहर में रोजगार के लिए बाहर से लोग आ रहे हैं कुछ यहां भी हैं, वो आते हैं अपने गम गलत करने के लिए, कुछ पल की खुशी के लिए, भूख पर नियंत्रण के लिए (तंबाकू और गुटका) लगातार मेहनत करने से होने वाली शरीर की तकलीफ मिटाने के लिए (शराब और ड्रग्स) और अय्याशी (इसके लिये कुछ खास नहीं कहूंगा) सहित कई प्रकट और अप्रकट कारणों से लोग नशे को अपने अंदर उतारते हैं।
नशा हर स्तर और कीमत पर-
इंदौर में नशा हर स्तर और हर कीमत पर मिल रहा है। ये सस्ता है और महंगा भी, ये फुटपाथों, इमारतों के सुनसान गलियारों, खौफजदा सन्नाटों पर होता है तो वहीं आलीशन पब, पार्टियों और होटलों, धनाड्यों के घरों और हुक्का-शीशा बारों में भी होता है, वो भी अलग-अलग स्वाद वाला। जिसे लड़के-लड़कियां, जी हां! लड़कियां पूरे शौक से करते हैं। फुटपाथ पर बच्चे जी हां! बच्चे, वाइटनर और थिनर का नशा करते हैं, वहीं धनाढ्य पार्टियों में खुलेआम ड्रग्स लेते हैं। ड्रग्स हर कीमत पर उपलब्ध है और तो और लोगों ने दवाइयों से भी नशा करना शुरू कर दिया है। जिनमें प्रमुख है नाइट्रोवेट और अल्फाजोलम, जिसे आसानी से दवाई की दुकान से खरीद सकते हैं। अल्फाजोलम में बेजोडाइपिन नामक तत्व होता है तो दिमाग की सोचने-समझने की क्षमता को नष्ट कर देता है। यानी हर कीमत हर स्तर पर नशा ढूंढ ही लिया गया है। ये नशा कहीं भूख मिटाने की मजबूरी है तो कहीं अय्याशी।
नशा और अपराध: एक खतरनाक जुगलबंदी-
नशा करने वाले नशे के आदी हो जाते हैं और धीरे-धीरे इसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं। इसके साथ ही नशा टॉक्सिक असर पैदा करता है और उत्तेजना, तनाव, गुस्सा जैसे क्षणिक मनोभावों को उग्र से उग्रतर बना देता है, जिसके चलते अपराध हो जाते हैं। नाट्रोवेट के नशे के चलते अपराधियों ने कई मामलों में जहां निर्दोषों को मौत के घाट उतारा है, वहीं नशे के लिए रुपये मांगने और नहीं देने पर अपराध होने की खबरें आती ही रहती हैं यानी रोजना की बात है।
अब है हाईटेक नशा-
इंदौर में अब नशा फैलाने के लिए गैजेट्स भी आने लगे हैं। पेन जैसे दिखने वाले ये गैजेट्स ई सिगरेट की तर्ज पर काम करते हैं और विभिन्न स्वादों में आराम से मिलते हैं। अभी कुछ दिन पहले एक महिला ने ऐसा ही एक गैजेट अपने बच्चे के हाथ में पाया और महापौर मालिनी गौड़ को पूरे मामले से अवगत कराया। जिस पर उन्होंने स्वयं डीआईजी संतोष सिंह से मिलकर पूरे मामले की जानकारी दी। अब पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। इस दौरान पुलिस ने कई पान की दुकानों पर छापामार कार्यवाही की और ऐसी कई चीजों को जब्त किया जो ऐसे ही गैजेट्स की तरह काम करती थीं। दुकानों से मालजब्त करने के बाद इनको सीलकर आगे कार्यवाही की जा रही है।
नशे के कारोबार में महिलाओं की भागीदारी- कुछ समय पहले प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शहर में अवैध शराब के धंधे में महिलाओं की भी भागीदारी है। ये महिलाएं कहीं तो खुद ही और कहीं अपने पतियों के धंधों को उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति में सम्हालती हैं। एक बार कुछ सूत्रों ने एक महिला से शराब की मांग की तो पूरी तरह से निश्चिंत होने के बाद उसने अंतर्वस्त्रों में छुपाकर रखी गई शराब उनको दी। चूंकि शराब के मामले को लेकर हंगामा न मच जाये और पुलिस को पता न चल जाये। अब बताने की जरूरत नहीं है कि ये धंधा भट्टियों से उठकर घरों में आ चुका है और एक घरेलु स्तर पर चलने वाला उद्योग भी बन गया है।
नशा और सफेदपोश अपराध-
नशा हर वर्ग तक फैला है और बच्चे से लेकर बड़े तक इससे प्रभावित हो रहे हैं। वहीं महिलाएं भी नशे से अपने आपको दूर नहीं रख पा रही हैं और गाहेबगाहे इस दलदल में धंसती जा रही हैं। इंदौर के हाईप्रोफाइल क्लबों में, शीशाबार में, महंगे होटलों में आयोजित होने वाली प्राइवेट पार्टियों में महिलाएं भी नशे में झूमने लगी हैं। नशे की हालत में मदहोश महिलाएं कई अनैतिक और आपराधिक वारदातों का शिकार हो जाती हैं। ये अपराध हाईप्रोफाइल तो होते ही हैं और इनके पीछे होते हैं सफेदपोश चेहरे जिनकी ताकत पैसों सहित हर स्तर पर बोलती है। पीडि़त ऐसे मामलों में डरकर, पैसे लेकर मामले को रफादफा करने में ज्यादा विश्वास रखती हैं। धीरे-धीरे ये भी एक हाईप्रोफाइल धंधे का रूप ले चुका है और वाइटकॉलर क्राइम यानी सफेदपोश अपराध बन चुका है जिसमें वेश्यावृत्ति भी शामिल है। निम्रश्रेणी के लोग जहां पकड़े जाते हैं, वहीं उच्चवर्ग तक हाथ डालना संभव ही नहीं है। हालांकि पुलिस ने कई ऐसे पबों और बारों पर छापामारा और पुरुष-महिलाओं को आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा है।
नशे में होते हैं सड़क हादसे-
प्रदेश के नवागत डीजीपी ऋषिकुमार शुक्ला जब अपने दौरे पर इंदौर पहुंचे तो उन्होंने नशा और इससे होने वाले सड़क हादसों को पुलिस के लिए एक चुनौती बताया था। इंदौर में नशे में गाड़ी चलाकर लोगों को जख्मी करने और मौत के घाट उतारे के किस्सों की कमीं नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार एक साल में नशे में दुर्घटनाओं से मरने वालों का आंकड़ा औसत हत्या में मौत के मामलों से ज्यादा था। अब आपको ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि ये कितना घातक है। सूत्रों अनुसार शहर के वाएन रोड जैसे शहर के मध्य क्षेत्र में भी शराबी गाडिय़ां देर रात अंधाधुंध भगाते हैं। यहां तलवलकर्स जिम के सामने तो एक खंबे को ही नशेड़ी से ठोंककर गिरा दिया था। बीआरटीएस पर तो धूम की तरह बाइक रेस होने की जानकारी भी मिल चुकी है। यहां नशेड़ी दूसरी गाडिय़ों को ठोंकते है वहीं पीडि़त की पिटाई करने से भी बाज नहीं आते और दबंगाई दिखाते हैं।
जहर बन रहा नशे की दवा-
देशभर में नशे का कारोबार करने वाले माफिया लोगों में इसकी लत को बढ़ाने के लिए खतरनाक प्रयोग करने लगे हैं। वे कोकीन, चरस, गांजा, अफीम को और अधिक नशीला बनाने के लिए इसमें कुत्ते मारने का केमिकल (जहर) मिलाकर नशेडिय़ों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। यह जहर चरस, अफीम जैसे नशीले पदार्थों में आसानी से मिल जाता है और देखने में पता भी नहीं चलता, जिसका फायदा तस्कर उठा रहे हैं। शहर भी इससे अछूता नहीं रहा है।
कुछ दिन पहले नारकोटिक्स और डीआरआई (डायरेक्टेड ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस) ने पीथमपुर में लगातार छापे मारकर कई जगहों से बड़ी मात्रा में सिंथेटिक ड्रग्स (एफेड्रिन, मेटा अल्फाजोलम और नाइट्रावेट जैसी घातक दवाइयां) बरामद की थीं। कार्रवाई के दौरान पता चला कि सिंथेटिक्स ड्रग्स में ट्रेडिशनल ड्रग्स (अफीम, गांजा, चरस आदि।) मिलाकर कॉकटेल कर दिया जाता है, जो ज्यादा नशा देेते हैं और लेने वाला उसका आदी होता जाता है। उसके नशा लेने की क्षमता पार हो जाती है, फिर उसे वही कॉकटेल नशे की जरूरत पड़ती है।
ये पता चला है-
जानकारी लगी है कि ड्रग्स में कुत्ते मारने का जहर मिलाया जा रहा है। इसे तस्करों की भाषा में स्टैगनी कहते हैं। इसकी मात्रा क्या है और कैसे मिलाते हैं, इसकी जांच की जा रही है। हालांकि जिन लैब में ड्रग्स का टेस्ट करवाते हैं, वहां इस जहर की जांच नहीं की जाती है। फिर भी पड़ताल में जुटे हैं।
- मुकेश खत्री, सुपरिंटेंडेंट, नारकोटिक्स, उज्जैन
एक अतथ्य जो सत्य न बन जाए- सुना था जब उड़ता पंजाब इंदौर में आई तो यहां उसके शीर्षक गीत उड़ता पंजाब पर खूब ठुमके लगाये गये। अगर इंदौर में नशा यूं ही बढ़ता रहा तो एक दिन उड़ता इंदौर फिल्म बनेगी और उसके टाइटिल ट्रैक पर इससे भी ज्यादा ठुमके लगेंगे और गाना कुछ यूं होगा-
नशे-कशों का चलता है दौर..... कर ले इसका अनलिमिटेड है सोर्स...इन्टॉक्सिकेशन (नशे) पर चलता है किसका जोर....उड़ता इंदौर..उड़ता इंदौर
दवाई की दुकानों पर भी है नशे का इंतजाम-
दवाई की दुकानों पर मिलने वाली दवाइयों से भी नशा किया जा रहा है। दुकान संचालक भी बिना डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन रिपोर्ट देखे दवाईयां दे देते हैं। अभी कुछ दिनों पहले दवाबाजार में नशा पैदा करने वाली दवाइयों का बड़ा जखीरा मिला था। जिसके साथ कुछ लोग गिरफ्तार किये गये थे, जो पढ़े-लिखे थे। इनमें से एक इस धंधे के लिंक को हिमाचल तक जोड़ता था। यानी पढ़े-लिखे लोग भी लालच के चलते इस धंधे को दूसरे राज्यों तक नेटवर्क के रूप में फैलाये बैठे हैं।
पुलिस का रवैया- पुलिस का रवैया ऐसे मामलों में ठीक ही रहता है, हालांकि गाहेबगाहे आरोप तो लगते ही रहते हैं। पुलिस आम लोगों से सहयोग की भी अपेक्षा ऐसे में रखती है। कई जगह लोग चोरी-छुपे सहयोग करते भी हैं और कुछ जगह लोग पचड़े में पडऩे से डरते हैं। क्राइम वॉच के जरिये बहुत अच्छा प्रतिसाद मिल सकता है। कई नशा करने वाले लोग जनसामान्य को परेशान नहीं करते हैं। ऐसे में लोगों का रवैया इनके प्रति नर्म भी रहता है और कहीं परिवार के लोग ही इसमें जुड़ जाते हैं। कहीं इनका खौफ भी होता है और पुलिस से सांठगांठ भी इसलिये जनसामान्य ऐसे मामलों में प्रत्यक्षत: सहयोग करने में कतराता ही है।
इतिहास में भी है नशे की भूमिका-आपको जानकार शायद आश्चर्य हो लेकिन मिलों की स्थापना से पहले मंदसौर से अफीम इंदौर होकर चीन के लिए भेजी जाती थी। ये काम अंग्रेजों की देख-रेख में हुआ करता था पर चीन में ओपियम वॉर होने के बाद ये धंधा बंद हो गया और इंदौर से व्यापारियों ने मिलों की स्थापना की जो कालांतर में यहां की संस्कृति का अभिन्न अंग बन गईं।
कैसे हो नशे का निरोध- नशे पर नियंत्रण कायम किया जा सकता है, पर इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता है। इंदौर एक महानगर है और यहां इसे किसी भी तरह से पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। इंदौर में धनाढ्य लोगों की पार्टियों में उनके रुतबे के चलते ड्रग्स के खेल को रोकना बहुत मुश्किल है वहीं दबचुपकर और कहीं मिलीभगत के चलते इसे रोका तो नहीं जा सकता पर इस पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। जिसमें आम लोगों (उन्हें बार-बार परेशान न किया जाए और वो सुरक्षित हों तभी वो सहयोग करेंगे।) से मदद लेने के साथ खुफिया तंत्र को भी मजबूत बनाया जाए तो प्रभावी नियंत्रण हो सकता है।
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